तिनके

ठहर जा

 

थोड़ा सा ठहरना ही तो है,
इस भागती सी ज़िन्दगी में,
कुछ पल, जो पता ही नहीं चले
कब, कैसे, कहाँ गुज़रे
आज समेटो ना बैठ कर….

चलती, दौड़ती पर ना थमती थी,
आज यूँ रुक कर शायद ये घड़ियां भी कह रही,
लो ये तुम्हारे सुकून के पल
बांटो ना कुछ अपने,
और कुछ अपनों के संग….

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