तिनके

इज़हार

जब बिखरोगी तुम, तो मैं संभाल लूंगा,
जो प्यार किया है तो, हर इम्तिहान दूंगा.

नहीं हूँ मैं औरों के जैसा;
मैं तो सच्चा प्यार करता हूँ,
तुम आज़मा कर तो देखो, मैं आंसू नहीं बस मुस्कान दूंगा.

ज़िन्दगी से जो हारा हुआ लगे तुम्हे तो,
मैं खुद हार कर, तुम्हे जीत उपहार दूंगा.

तुमने मेरे बंद दिल में,
दस्तक प्यार कि जो दी है;
अब जो साथ हूँ तुम्हारे तो, कसम है कि हर कदम साथ दूंगा.

तिनके

खो कर जो पाया

जो यादें याद भी ना थी,
आज वो यादें याद आ रही हैं…
कुछ चोट जो भूला दिय थे,
रिश्तों की मिठास बनाये रखने को,
आज आंसुओं में बह बहकर,
दर्द उनका कुछ कम सा होता जा रहा है.

जीवन भर का साथ, ना सही
पर खुद से किया वादा तो निभाया…
अधूरापन सा है थोड़ा अब भी,
लेकिन खुद को है फिर से पाया

तिनके

ज़िन्दगी

कल की सोच, कल को संवारने,
यूँ भागे जा रहे हैं सब…
मंज़िल पे तो मौत मिलेगी,
पर ये सफर, जिसका नाम ज़िन्दगी,
उसे जी पा रहे हैं कब?

तिनके

साथ

क्या एक दूसरी दुनिया है,
जहाँ मुलाकात होगी फिर….

कितनी बातें रखी हैं मैंने कहने को,
संजो कर यादों के डिब्बे में,
पहले तो अक्सर भूल जाया करती थी,
तुमसे कह कर.

तुमको भी मेरी याद आती होगी ना,
फिर मुझे ही बुला लो अपने पास,
तुम ही तो कहते थे,
मुझे बिन देखे तुमसे रहा नहीं जाता.

बहुत कोशिशें की मैंने,
पर ना आंसुओं का ये सैलाब रुका,
और ना ढूंढ पायी हूँ मैं,
तुम बिन अपना कोई अस्तितव.

क्या एक दूसरी दुनिया है,
जहाँ मुलाकात होगी फिर….

सात जन्मों का साथ मिले ना मिले,
पर इस दुनिया में हो, या उस दुनिया में,
अकेला मत छोड़ जाना तुम मुझे,
यूँ फिर कभी….

तिनके

दूरि

छोड़ आये हैं हम कहीं,

दिल का एक टुकड़ा, होटों की हसीं,
प्यार की वो खुशबु, बातों की लड़ी…

कुछ मीठे पल, कुछ गुदगुदाते एहसास,
मुस्कान खिलती थी होटों पे, जिनके होने से पास…

मन में बसा कर इन यादों का कारवां,
चल दिए हैं अब तो…

उम्मीदों की कश्ती का सहारा है,
जाने आगे मंज़िल मिले,
या हो फिर किसी तूफ़ान को हमारा इंतज़ार.

तिनके

इज़हार

तेरे इश्क़ का अक्श,
मेरी आँखों में..
मेरे इश्क़ का,
अपनी आँखों से पूछ.
मोहताज़ नहीं ये किसी,
जुबां-ऐ-इज़हार का….

क्या कहूँ अपनी साँसों से ,
गर पूछ बैठें वो अपनी कीमत,
क्या बयां करूँ धड़कनों को,
गर समझें ना वो,
दुनिया मेरी तो उसपे ही जाए सिमट.

उसके होने से ही तो मैं हूँ,
उसके ना होने से…
वजूद ही क्या मेरा?

तिनके

कहानी

सच ही तो कहते हो तुम,
क्या हासिल किया है मैंने?
किस बात पर गुमान हो?
ना आज मेरी जीत है, ना मेरे आंसुओं का कोई खरीदार,
और जिस कल पे कभी इतराई थी मैं…..
तुम जाते जाते,
उन् लम्हों को भी कहानियां कह गए.

तिनके

ठहर जा

 

थोड़ा सा ठहरना ही तो है,
इस भागती सी ज़िन्दगी में,
कुछ पल, जो पता ही नहीं चले
कब, कैसे, कहाँ गुज़रे
आज समेटो ना बैठ कर….

चलती, दौड़ती पर ना थमती थी,
आज यूँ रुक कर शायद ये घड़ियां भी कह रही,
लो ये तुम्हारे सुकून के पल
बांटो ना कुछ अपने,
और कुछ अपनों के संग….

तिनके

अंतर्द्वंद्व

नहीं तुमसे, किसीसे, या दुनिया से नहीं है,

ये मेरी खुद से ही है मेरी लड़ाई;

की कब, कैसे और क्यों खोने दिया खुद को,

क्यों खुद ही मैंने अपनी हस्ती मिटाई।

 

क्यों कोई मुझे कुछ समझे, माने, जाने,

जब मैंने ही मेरे वजूद को ना पहचाना;

क्यों कोई मुझसे पूछे – क्या चाहती हूँ मैं,

जब अपने हक़ को मैं खुद ही दरकिनार करती आयी।

 

क्यों सब दिख कर भी अनदेखा सा हुआ,

क्यों हर गलती मैं माफ़ करती आयी;

क्यों सोचा तुम बदल सकते हो कभी,

और उस सोच में बस खुद को ही बदलती आयी।

 

जब कोई पूछता है कहाँ है वो लड़की,

जो सही गलत की छोटी बातों पे भी लड़ने उठ जाती थी;

तो सवाल उठता है मन में – कौन हूँ मैं?

और ढूंढ़ने निकल परती हूँ, अपनी ही खोयी परछाई।

 

लेकिन आज कहना है मुझे भी कुछ,

हाँ तुमसे, हर किसीसे, और इस दुनिया से –

मेरा भी एक सपना है, मेरे भी अरमान हैं,

मेरा भी आत्मविश्वास है, मेरा भी स्वाभिमान है;

मैं भी एक इंसान हूँ, कभी कमज़ोर जरूर पड़ सकती हूँ,

पर खुद को वापस लाने  को, आज फिर उठ खड़ी हो सकती हूँ।