तिनके

अंतर्द्वंद्व

नहीं तुमसे, किसीसे, या दुनिया से नहीं है,

ये मेरी खुद से ही है मेरी लड़ाई;

की कब, कैसे और क्यों खोने दिया खुद को,

क्यों खुद ही मैंने अपनी हस्ती मिटाई।

 

क्यों कोई मुझे कुछ समझे, माने, जाने,

जब मैंने ही मेरे वजूद को ना पहचाना;

क्यों कोई मुझसे पूछे – क्या चाहती हूँ मैं,

जब अपने हक़ को मैं खुद ही दरकिनार करती आयी।

 

क्यों सब दिख कर भी अनदेखा सा हुआ,

क्यों हर गलती मैं माफ़ करती आयी;

क्यों सोचा तुम बदल सकते हो कभी,

और उस सोच में बस खुद को ही बदलती आयी।

 

जब कोई पूछता है कहाँ है वो लड़की,

जो सही गलत की छोटी बातों पे भी लड़ने उठ जाती थी;

तो सवाल उठता है मन में – कौन हूँ मैं?

और ढूंढ़ने निकल परती हूँ, अपनी ही खोयी परछाई।

 

लेकिन आज कहना है मुझे भी कुछ,

हाँ तुमसे, हर किसीसे, और इस दुनिया से –

मेरा भी एक सपना है, मेरे भी अरमान हैं,

मेरा भी आत्मविश्वास है, मेरा भी स्वाभिमान है;

मैं भी एक इंसान हूँ, कभी कमज़ोर जरूर पड़ सकती हूँ,

पर खुद को वापस लाने  को, आज फिर उठ खड़ी हो सकती हूँ।

3 thoughts on “अंतर्द्वंद्व”

  1. बहुत खूबसूरत ,।। खुद को पहचानना ही जीवन का सार है ।

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